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मंदी: साल बाद भी उबर न पाई दुनिया

मंदी: साल बाद भी उबर न पाई दुनिया

लेहमन ब्रदर्स के दिवालिया घोषित होने के बाद अंतरराष्ट्रीय वित्त बाज़ार में भूचाल आ गया
अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था में सितंबर 2008 में आए भूचाल को एक साल हो गया है. निर्यात गिरने और विकास दर घटने के बावजूद चाहे भारत पर इसका उतना बुरा असर नहीं पड़ा है लेकिन अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था अब भी वित्तीय संकट के असर से उबर नहीं पाई है.

अमरीका से ठीक एक साल पहले शुरु हुए उस वित्तीय भूचाल पर नज़र डाले तो विश्व के अगस्त 2007 से ही नकदी के संकट में फंसते चले जाने के सबूत थे. लेकिन इसने सही मायने में पिछले साल सितंबर में विकराल रूप लिया.


शुरुआत हुई सात सितंबर को होम-लोन का कारोबार करने वाले अमरीकी वित्तीय संस्थानों फ़ेनी मे और फ़्रेडी मैक को सरकारी नियंत्रण में लिए जाने से, और पूरे सप्ताह लेहमन ब्रदर्स के भविष्य को लेकर आशंकाएँ बनी रहीं. अंतत: 14 सितंबर की देर रात लेहमन ब्रदर्स दिवालिया घोषित होने वाली सबसे बड़ी अमरीकी कंपनी बन गई. लेहमन ब्रदर्स के पतन के बाद वैश्विक वित्त व्यवस्था ने एक अनिश्चित राह पकड़ ली, और साल भर बाद भी संकट के बादल नहीं छंटे हैं.

फ़ेडेरल नेशनल मॉरगेज एसोसिएशन यानी फ़ेनी मे और फ़ेडेरल होम लोन मॉरगेज कॉरपोरेशन यानि फ़्रेडी मैक सरकार समर्थित वित्तीय संस्थान है. जिस समय इन पर संकट आया अमरीका के होम-लोन बाज़ार का क़रीब आधा हिस्सा इन दोनों के पास था.

अमरीका में रह रहे अर्थशास्त्री और विश्व बैंक के पूर्व उपाध्यक्ष शाहिद जावेद बर्की ने इनके कामकाज़ के तरीके के बारे में बताया, "ये दोनों संस्थान कॉमर्शियल बैंकों द्वारा वितरित होम-लोन को ख़रीदते हैं. उनको फिर नया रूप देकर बीमा कंपनियों या दीर्घावधि के निवेश में इच्छुक अन्य वित्तीय संस्थानों को आगे बेचते हैं. इस तरह से ये कॉमर्शियल बैंकों के लिए सेंकेंडरी मार्केट उपलब्ध कराते हैं. फ़ेनी मे छोटे होम-लोन को ख़रीद कर उन्हें मिलाकर बड़े निवेश उत्पाद के रूप में बेचता है, जबकि फ़्रेडी मैक बड़े ऋण को लेकर ऐसा ही काम करता है."
सरकारी सहायता

जब अमरीका की हाउसिंग मार्केट में संकट आया और घरों के दाम तेज़ी से गिरने शुरू हुए और बैंकों को नक़दी के संकट का सामना करना पड़ा तो फ़ेनी मे और फ़्रेडी मैक के लिए अपने पैरों पर खड़ा रहना मुश्किल हो गया. दोनों ही बैंक रोज़ाना लाखों डॉलर की दर से धन गंवा रहे थे.

ऐसे में अमरीकी सरकार और अमरीकी केंद्रीय बैंक तुरंत हरकत में आए. तत्कालीन वित्त मंत्री हेनरी पॉलसन ने सरकारी खज़ाने से 200 अरब डॉलर की नक़दी दे कर फ़ेनी मे और फ़्रेडी मैक को दिवालिया होने से बचाने की सरकार की मजबूरी के बारे में कहा था, "ये संकट सीधे-सीधे आम अमरीकी परिवार पर बुरा असर डालेगा. परिवार के बजट, घरों की क़ीमत, बच्चों की पढ़ाई और सेवानिवृति के बाद के दिनों के लिए बचा कर रखे गए धन...ये सब प्रभावित होंगे. यदि इन दो बैंकों को बचाया नहीं गया तो आम अमरीकी परिवारों और व्यवसायों को रिण मिलना मुश्किल हो जाएगा. और अंतत: इससे अमरीका का आर्थिक विकास प्रभावित होगा, बेरोज़गारी बढ़ेगी."

दो बड़े बैंकों को सरकारी जीवन-धारा दिए जाने पर अमरीकी बैंकों और वित्तीय संस्थानों ने तो राहत की सांस ली ही, चीन और जापान जैसे देशों ने भी इस त्वरित कार्रवाई के लिए अमरीकी सरकार की तारीफ़ की थी. दरअसल फ़ेनी मे और फ़्रेडी मैक को सरकारी समर्थन मिले होने के कारण इन देशों ने भी इसमें बड़ा निवेश कर रखा था.

वित्त बाज़ार में भूचाल
लेकिन फ़्रेडी मैक और फ़ेनी मे को बचाए जाने के बाद भी वित्तीय संकट की स्थिति और भयानक होती जा रही थी. अमरीका के बड़े निवेश बैंकों में से एक लेहमन ब्रदर्स के पाँव डगमगा रहे थे. लेकिन पूर्व में बेअर स्टर्न्स बैंक को सहारा देने वाली अमरीकी सरकार ने लीमैन ब्रदर्स को सहारा देने से इनकार कर दिया.

अंतत: 15 सितंबर की सुबह लेहमन ब्रदर्स के दिवालिया घोषित होने की ख़बर ने न सिर्फ़ अमरीका बल्कि पूरी दुनिया के वित्तीय बाज़ार में भूचाल ला दिया. ये सिर्फ़ एक प्राइवेट निवेश बैंक की ही नाकामी नहीं थी, बल्कि इसने पूँजीवाद के सात दशकों से प्रचलित स्वरूप पर ही सवालिया निशान लगा दिया.

उसी हफ़्ते मीडिया में सामने आई जानकारी के अनुसार अमरीका सरकार लेहमन ब्रदर्स को बचाना तो चाहती थी, लेकिन पूरे मन से उसने इसकी कोशिश नहीं की. आख़िर पूँजीवाद के एक प्रतीक को क्यों नहीं बचाया जा सका? ब्रिटेन के क्रेनफ़ील्ड स्कूल ऑफ़ मैनेजमेंट के प्रोफ़ेसर सुनील पोशाकवाले ने इस बारे में बताया, "जब लेहमन ब्रदर्स पर संकट आया तो हेनरी पॉल्सन को उम्मीद थी कि पिछली बार बेअर स्टर्न्स को जैसे अमरीकी बैंकों की मदद से बचा लिया गया था, उसी तरह इस निवेश बैंक को भी बचा लिया जाएगा. लेकिन जब उन्हें अहसास हुआ कि ऐसा संभव नहीं है, तो उन्होंने ब्रिटेन के बार्कलेज़ बैंक से संपर्क किया."

"समस्या ये थी कि बार्कलेज़ संपूर्ण लेहमन ब्रदर्स में नहीं बल्कि उसकी अच्छी परिसंपत्तियों मात्र में दिलचस्पी ले रहा था, जबकि पॉल्सन इसके ख़िलाफ़ थे. इसी तरह ब्रिटेन की सरकार और वित्तीय नियामक संस्थाओं की माँग थी कि लीमैन ब्रदर्स का बार्कलेज़ द्वारा अधिग्रहण की बात आगे बढ़े इससे पहले अमरीका सरकार पूरे सौदे को किसी न किसी तरह की गारंटी दे. दोनों ही बातें संभव नहीं हो पाई, और लीमैन ब्रदर्स का दिवाला निकल गया."
निवेश बैंकों की कार्य प्रणाली

बेअर स्टर्न्स और मेरिल लिंच के दूसरे अमरीकी बैंकों के हाथों में चले़ जाने, और लेहमन ब्रदर्स के दिवालिया घोषित होने के साथ ही, पूंजीवाद के पोस्टर-ब्वॉय माने जाने वाले निवेश बैंकों की कार्य-प्रणाली पर ही सवालिया निशान उठने लगा. आख़िर क्यों बिखर गई निवेश बैंकों की दुनिया? लंदन में एबीएन एमरो बैंक से जुड़े निवेश बैंकर रवीन्द्र राठी ने इस बारे में बताया, "निवेश बैंकों का मॉडल काफ़ी जटिल हो गया था. उनकी फ़ाइनेंसिंग की टाइमिंग भी ठीक नहीं थी. वो अल्पावधि की फंडिंग और दीर्घावधि का निवेश कर रहे थे. इसके साथ-साथ बैलेंसशीट से बाहर ऐसे कई तरह के निवेश थे जिनकी बहुत ही जटिल सीडीओ के अंतर्गत ट्रेडिंग होती थी. इसके भी ऊपर सीडीएस जैसे और ज़्यादा ज़ोख़िम वाले उपक्रम थे."

"कई सालों से जारी कम ब्याज़ दर के वातावरण में प्रचूर मात्रा में ऋण उपलब्ध हो गया. जो कर्ज़ चुका पाने की स्थिति में किसी तरह से नहीं थे उन्हें मनचाही मात्रा में ऋण मिल रहा था. हाउसिंग सेक्टर में क़ीमतों में बेतहाशा तेज़ी आती जा रही थी. निवेश बैंक भी इनमें डूबते जा रहे थे. दोष नियामक संस्थाओं का भी था. या तो उनके पास जटिल निवेश उपक्रमों को समझने वाले लोग नहीं थे, या उनके पास इन सबके लिए समय नहीं था."

भारत पर ज़्यादा बुरा असर नहीं
लेहमन ब्रदर्स के दिवालिया घोषित होने से पूरी दुनिया के वित्तीय बाज़ार हिल गए. शेयर सूचकांक गोते लगा रहे थे. कई शेयर बाज़ारों में तो ऐहतियातन कारोबार बंद कर दिया गया. भारत का सेन्सेक्स सूचकांक भी 3.35 प्रतिशत नीचे बंद हुआ. बैंकिंग समेत तमाम सेक्टर के शेयर ज़मीन छूते नज़र आए.

लेकिन अगले कुछ दिनों में भारत की वित्तीय व्यवस्था पर उतना बुरा असर नहीं पड़ा. मुंबई स्थित बैंकिंग क्षेत्र के विशेषज्ञ विनीत गुप्ता के अनुसार ऐसा भारतीय वित्त व्यवस्था के अंतरराष्ट्रीय वित्त व्यवस्था से पूरी तरह जुड़े नहीं होने के कारण ही हो पाया. उन्होंने कहा, "कई अंतरराष्ट्रीय मानकों को पूरा करने के बाद भी भारतीय बैंक कहीं ज़्यादा कड़े नियमों के अधीन काम करते हैं. इस कारण अमरीका, ब्रिटेन या अन्य कई पश्चिमी देशों के बैंकिंग सेक्टर की तरह यहाँ संकट देखने को नहीं मिला."

उन्होंने कहा, "लेहमन ब्रदर्स के दिवालिया घोषित होने के बाद दुनिया के कई देशों में बैंकों के सरकारी शरण में जाने को देखते हुए इतना ज़रूर हुआ कि स्टेट बैंक और आईसीआईसीआई बैंक जैसे भारतीय बैंकों ने अपनी अंतरराष्ट्रीय महत्वाकांक्षा को अभी ठंडे बस्ते में डालना ही उचित समझा है. अब वे बेलगाम विस्तार के बारे में बिल्कुल नहीं सोचेंगे. रिज़र्व ने कुछ नए ऐहतियाती निर्देश जारी किए. ये सब भारत के बैंकिंग सेक्टर के लिए अच्छी बात ही है."

पिछले सप्ताहांत लंदन में ही जी-20 देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक में अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संकट के एक साल पूरे होने पर स्थिति की समीक्षा की गई. सहमति बनी कि वित्तीय संकट से निपटने के लिए सरकारी हस्तक्षेप की नीति को अभी जारी रखा जाए. मतलब बुरे क़र्ज़ को सरकारी खाते में डालने, बैंकों को धराशाई होने से बचाने और भारी मात्रा में करेंसी छापने जैसे प्रयासों को अभी चालू रखा जाए.

यानी वित्तीय संकट के लगातार कम होते जाने और अर्थव्यवस्था के पटरी पर वापस लौटने के कुछ संकेत दिख रहे हैं, लेकिन मामला पूरी तरह संभले, इसके लिए अभी लंबा इंतजार करना पड़ सकता है.

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श्रीलंका: विस्थापितों के हालात 'भयंकर'


विस्थापित तमिल नागरिक

अंतिम युद्ध में लाखों लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ा.

श्रीलंका के एक वरिष्ठ तमिल नेता ने सरकार से विस्थापित नागरिकों को जल्दी से जल्दी उनके घरों तक वापस पहुँचाने और बसाने की अपील की है.

वी आनंदसांगरी ने शिविरों में रह रहे और युद्ध में बेघर हो चुके नागरिकों की स्थिति को अत्यंत भयानक बताया है.

तमिल यूनाइटेड लिबरेशन फ़्रंट के प्रमुख ने कहा कि लाखों लोग मुश्किल और ग़रीबी का सामना कर रहे हैं.

उन्होंने कहा कि उत्तरी श्रीलंका में तमिल नागरिकों के लिए बने शिविरों में भोजन, स्वास्थ्य और सफ़ाई की समस्याएँ हैं.

संयुक्त राष्ट्र ने कहा है कि पिछले दिनों सरकार और तमिल विद्रोहियों के बीच हुए संघर्ष में क़रीब तीन लाख लोगों को विस्थापित होना पड़ा है.

नागरिकों को विभिन्न शिविरों में रखा गया है जिनमें से ज़्यादातर उत्तरी शहर वावूनिवा के पास मेनिक फ़ार्म में स्थित हैं.

मेनिक फ़ार्म शिविरों को संयुक्त राष्ट्र ने दुनिया का सबसे बड़ा विस्थापन शिविर बताया है. यहाँ युद्ध में विस्थापित हुए क़रीब दो लाख बीस हज़ार लोगों को रखा गया है.

स्वास्थ्य चिंताएं

यूएलएफ़ के नेता वी आनंदसांगरी श्रीलंका के कुछ उदारवादी तमिल राजनेताओं में से एक हैं. उन्होंने विद्रोहियों के ख़िलाफ़ उठाए गए सरकार के रुख़ का भरपूर समर्थन किया था.

नागरिकों ने तमिल विद्रोहियों के कब्ज़े वाले इलाके से भागते वक्त अपनी जान दाँव पर लगा दी क्योंकि विद्रोही उन पर गोलियाँ बरसा रहे थे. अगर सरकार को ऐसे लोगों पर तमिल विद्रोही होने का शक़ है तो दो ज़िलों- किलिनोच्ची और मुल्लेतिवू की सारी जनसंख्या ही तमिल विद्रोही होनी चाहिए

आनंदसांगरी ने बीबीसी से कहा, "शिविरों में रह रहे लोगों से मिली सूचनाओं के अनुसार कुछ क्षेत्रों की हालत अच्छी है जबकि बहुत सी जगहों की हालत भयानक है."

उनके अनुसार, "शिविरों में स्वास्थ्य, पानी और सफ़ाई की स्थिति भयानक है. पानी की कमी की वजह से बहुत से लोग कई-कई दिनों तक नहा नहीं पाते हैं. इससे बहुत से लोगों को त्वचा संबंधी बीमारियाँ हो गई हैं."

उन्होंने कहा, "गर्भवती महिलाएँ और नवजात शिशु शिविरों में तपती गर्मी की वजह से भयानक स्थितियों से गुज़र रहे हैं."

श्रीलंका की सरकार ने माना है कि कुछ शिविरों की हालत आदर्श नहीं है लेकिन कहा कि दूसरे अनेक शिविरों में सुविधाओं में सुधार किया गया है.

सरकार का कहना है कि पूरी तरह से भरे हुए शिविरों से भीड़ कम करने और नए शिविर बनाने के लिए कुछ ज़मीन भी आवंटित की गई है.

संयुक्त राष्ट्र और दूसरे सहायता संगठन भी मानवीय कार्यों को संपन्न कराने के लिए शिविरों तक बेहतर पहुँच की माँग कर रहे हैं.

पुनर्वास की योजना

श्रीलंका सरकार सहायता संगठनों को लेकर कुछ आशंकित है और उसने शिकायत की है कि इन संगठनों ने बीते दिनों में तमिल विद्रोहियों की मदद की है.

श्रीलंका का कहना है कि उनकी योजना छह महीनों के भीतर ज़्यादातर शरणार्थियों का पुनर्वास कराने की है.

तमिल विद्रोहियों के जाने-माने आलोचक आनंदसांगरी ने शिविर के हर तमिल नागरिक को संभावित तमिल विद्रोही की तरह देखने पर भी सरकार की खिंचाई की है.

श्रीलंका ने कहा है कि उन्हें शिविरों में छिपे प्रमुख तमिल विद्रोहियों को खोज निकालने के लिए समय की ज़रूरत है.

उन्होंने कहा, "नागरिकों ने तमिल विद्रोहियों के कब्ज़े वाले इलाके से भागते वक्त अपनी जान दाँव पर लगा दी क्योंकि विद्रोही उन पर गोलियाँ बरसा रहे थे.

अगर सरकार को ऐसे लोगों पर तमिल विद्रोही होने का शक़ है तो दो ज़िलों- किलिनोच्ची और मुल्लेतिवू की सारी जनसंख्या ही तमिल विद्रोही होनी चाहिए."

श्रीलंका के अधिकारियों ने कहा है कि उन्हें तो विद्रोहियों के क़ब्ज़े वाले स्थान से आए लाखों-नागरिकों के अचानक आगमन पर ख़ुश होना चाहिए.

सरकार ने कहा कि उसे युद्ध के बाद पुनर्वास के काम के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय की मदद की भी ज़रूरत है.

टीयूएलएफ़ नेता ने कहा कि श्रीलंका के सुरक्षा बल विस्थापित नागरिकों के लिए अच्छा राहत कार्य कर रहे हैं लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि यह पर्याप्त नहीं है.

उन्होंने कहा, "विस्थापित नागरिकों की संख्या की वजह से सरकार अपने बल पर यह समस्या नहीं सुलझा सकती."

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किस मोड़ पर है भारतीय अर्थव्यवस्था?

किस मोड़ पर है भारतीय अर्थव्यवस्था?


वर्ष 2006 के मार्च महीने में ब्रिटेन का आम बजट पेश किया गया. बजट में ब्रितानी वित्त मंत्री के भाषण का एक मुख्य अंश कुछ यूँ था.
भारत और चीन से मिलने वाली कड़ी प्रतिस्पर्धा का मतलब है कि हम हाथ पर हाथ धर कर नहीं बैठे रह सकते
इससे पहले अमरीकी राष्ट्रपति बुश ने अपने अहम राष्ट्रीय भाषण में कुछ ये कहा,
हम हाथ पर हाथ धर कर नहीं बैठ सकते. दुनिया की अर्थव्यवस्था में हम भारत और चीन जैसे नए प्रतियोगी देख रहे हैं.”
विभिन्न क्षेत्रों में विकास दर

दो बड़े और विकसित देश और दोनों की टिप्पणियों में एक सी बात-चीन और भारत जैसी उभरती आर्थिक महाशक्तियों का मुकाबला करना होगा.
आख़िर क्यों छाया हुआ है भारत का हौवा पूरी दुनिया में. जवाब जानने के लिए नज़र डालते हैं कुछ आँकड़ों पर. इस साल पेश किए गए आर्थिक सर्वेक्षण में वर्ष 2005-06 में भारत में 8.1 प्रतिशत विकास दर की बात कही गई थी.
वहीं भारतीय रिज़र्व बैंक ने अप्रैल में अपनी वार्षिक नीति पर जारी बयान में भारत में वर्ष 2006-07 में विकास दर 7.5-8.0 फ़ीसदी के बीच रहने की उम्मीद जताई है.
भारतीय अर्थव्यवस्था की मौजूदा स्थिति पर केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री पवन कुमार बंसल कहते हैं, “भारतीय अर्थव्यवस्था बहुत अच्छे मोड़ पर है इस वक़्त हमें तो उम्मीद है कि आने वाले सालों में विकास दर और बढ़ेगी.”
पिछले दो सालों में भारत में 8.5 और 7.5 फ़ीसदी की दर से विकास होता रहा है.
बेहतर स्थिति
विकास दर के अलावा अगर आर्थिक प्रगति के दूसरे मापदंडों की बात करें तो भी भारतीय अर्थव्यवस्था काफ़ी बेहतर स्थिति में नज़र आ रही है.
सकारात्मक पहलू
विकास दर में बढ़ोत्तरी
बढ़ता विदेशी निवेश
औद्योगिक और सेवा क्षेत्र में विकास
विदेशी मुद्रा भंडार में वृद्धि
सेंसेक्स में लगातार उछाल
मुद्रा स्फ़ीति काबू में
24 मार्च को ख़त्म हुए सप्ताह में विदेशी मुद्रा भंडार करीब 148.662 अरब डॉलर तक पहुँच गया. कभी विदेशी संस्थानों से कर्ज़ लेने वाले भारत ने वर्ष 2003 में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष को कर्ज़ देने की घोषणा की.
वर्ष 2005 में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में 33.8 फ़ीसदी की वृद्धि हुई.
ये तो हुई सरकारी आँकड़ों की बात. हाल ही में संयुक्त राष्ट्र ने भी एक रिपोर्ट जारी की है जिसमें कहा गया है कि अगले दो सालों तक भारत में आठ फ़ीसदी की दर से विकास होता रहेगा, औद्योगिक क्षेत्र में आठ तो सेवा क्षेत्र में 8.5 प्रतिशत की विकास दर रहेगी.
भारत की गिनती अब दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में होती है. विश्व की अर्थव्यवस्था को चलाने में भारत बड़ा खिलाड़ी बनता जा रहा है. आईटी सेक्टर में पूरी दुनिया भारत का लोहा मानती है.
औद्योगिक-सेवा क्षेत्र में विकास
भारत आउटसोर्सिंग का बड़ा बाज़ार उभर कर सामने आया है
सवाल ये है कि आख़िर विकास रूपी गाड़ी के वो कौन से इंजन हैं जिनके चलते भारतीय अर्थव्यवस्था की गाड़ी सरपट दौड़े जा रही है.
भारत की अर्थव्यवस्था में सबसे ज़्यादा विकास हुआ है उद्योग और सेवा क्षेत्र में. वर्ष 2002-03 में दसवीं पंच वर्षीय योजना शुरू होने के बाद से इन दोनों क्षेत्रों में सालाना 7 फ़ीसदी या उससे ज़्यादा की दर से विकास हुआ है.
उद्योगो में मैन्यूफैक्चिरिंग, खनन और बिजली क्षेत्र अग्रणी रहे हैं. जबकि सेवा क्षेत्र की बात करें तो इसमें मोटे तौर पर तीन क्षेत्र आगे हैं- बैंकिंग, बीमा और रीयल ऐस्टेट जिनमें 9.5 फ़ीसदी के दर से विकास हुआ है.
फ़ोर्ब्स पत्रिका की मानें तो दुनिया के कुल अरबपतियों की सूची में भारत के 23 अरबपति शामिल हैं.
दूसरा पहलू
कृषि में विकास दर उद्योग और सेवा क्षेत्र के मुकाबले कहीं पीछे है
कुल मिला कर कहें तो बहुत ही सकारात्मक, उज्जवल और चमकती दमकती तस्वीर उभर कर सामने आ रही है मौजूदा भारतीय अर्थव्यवस्था की.
लेकिन तस्वीर का एक पहलू और भी है जो आँकड़ो की चमक दमक को कुछ हदतक तो फ़ीका कर देता है.
पारंपरिक तौर पर कृषि प्रधान कहे जाने वाले भारतवर्ष में 2005-06 में कृषि की विकास दर केवल 2.3 फ़ीसदी रहने की बात कही गई थी.2002-03 में तो हालत इतनी बदतर हो गई थी कि ये शून्य से भी नीचे चली गई थी(-6.9 फ़ीसदी)
ये स्थिति तब है जब आज भी भारत की करीब 65 से 70 फ़ीसदी जनसंख्या रोज़गार के लिए कृषि या कृषि आधारित कामों पर निर्भर करती है.
आधारभूत ढाँचा-रोज़गार?
खराब सड़कें और आधारभूत ढाँचे की कमी निवेशकों को दूर भगा सकती है
भारत में कई जगहों में अब भी सड़क, बिजली और पानी जैसी मूलभूत ज़रूरतों की कमी है और ये तस्वीर सिर्फ़ गाँवों की ही नहीं- बंगलौर जैसे शहरों की भी है.
इन मूलभूत ज़रूरतों के अभाव में उद्योग और सेवा सेक्टर में जारी विकास इतनी ही गति से बरकरार रह पाएगा ये भी एक बड़ा सवाल है.
क्रेडिट एजेंसी क्रिसिल के निदेशक डीके जोशी भारत के आर्थिक विकास से खुश तो हैं लेकिन आधारभूत ढाँचे और बेरोज़गारी जैसी समस्याओं को चिंता का विषय मानते हैं.
रोज़गार के अवसरों की बात करें तो भारत में इस समय करीब तीन करोड़ साठलाख बेरोज़गार युवा है.
कहने को भारत दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है लेकिन मानव विकास सूचकाँक में भारत का नंबर है 127. पिछले साल आई संयुक्त राष्ट्र की विकास रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत में हो रहे विकास का फ़ायदा ग़रीबों तक नहीं पहुँच पा रहा है.
राह किधर?
तेल की आसमान छूती कीमतें और भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाला दूरगामी असर भी चिंता का विषय है. अनुमान के मुताबिक मौजूदा 25 लाख बैरल प्रति दिन तेल की खपत के मुकाबले, 2010 तक भारत को 31 लाख बैरल तेल प्रति दिन चाहिए होगा.
भारतीय अर्थव्यवस्था में कुल आयात का 30 प्रतिशत हिस्सा तेल का होता है.
एक ओर होंगे सेवा क्षेत्र और विदेशी निवेश जैसे पहलू जहाँ माहौल सकारात्मक है. दूसरी तरफ़ है मध्यम वर्ग की अर्थव्यवस्था जिमसें अपार संभावनाएँ हैं लेकिन कई तरह की परेशानियाँ भी हैं और तीसरे स्तर पर है एक ऐसा वर्ग जिसका ऊपर के दो वर्गों से कोई लेना देना नहीं है, उनकी समस्याएँ शायद वैसी की वैसी रहने वाली हैं.
आलोक पुराणिक, विशेषज्ञ
चीन से तुलना करें तो विदेशी निवेश, आधारभूत ढाँचे और विकास दर- हर मायने में चीन भारत से आगे है.
भारतीय अर्थव्यवस्था और उसकी दो विपरीत तस्वीरें. आख़िर क्या है वास्तविकता.
आर्थिक मामलों के जानकार आलोक पुराणिक के अनुसार भारतीय अर्थव्यवस्था की मिश्रित तस्वीर उभर कर सामने आ रही है.
उनका कहना है, "आने वाले सालों में भारतीय अर्थव्यवस्था का तीन स्तरों पर वर्गीकरण हो जाएगा, एक ओर होंगे सर्विसिज़ सेक्टर, विदेशी निवेश और सेंसेक्स जैसे पहलू जहाँ माहौल काफ़ी सकारात्मक है. दूसरी तरफ़ है मध्यम वर्ग की अर्थव्यवस्था जिमसें अपार संभनाएँ दिखाई पड़ती हैं लेकिन कई तरह की परेशानियाँ भी हैं और तीसरे स्तर पर है एक ऐसा वर्ग जिसका ऊपर के दो वर्गों से कोई लेना देना नहीं है, उनकी समस्याएँ शायद वैसी की वैसी रहने वाली हैं और शायद बढ़ने वाली हैं."
औद्योगिक और सेवा क्षेत्र में विकास की बदौलत भारत में विकास की गाड़ी तेज़ी से दौड़ तो रही है लेकिन अभी भी उसके सामने कई तरह की चुनौतियाँ हैं.
लिहाज़ा फ़र्राटे से दौड़ रहे विकास के घोड़े को अगर लंबे रेस का घोड़ा बनना है तो आधारभूत ढाँचे, सड़क, बिजली और पानी जैसी मूलभूत ज़रूरतों की सही खुराक सही समय पर इसे देते रहना होगा.

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तालेबान का प्रभाव-नक्शे में

पाक-अफ़ग़ान सीमा पर अमरीका ने तालेबान समेत चरमपंथी संगठनों के ख़िलाफ़ अभियान छेड़ रखा है. मुख्य संघर्ष क्षेत्र नक्शे में दिखाए गए हैं
इस्लामिक चरमपंथ के ख़िलाफ़ लड़ाई में अमरीका ने अफ़ग़ानिस्तान-पाकिस्तान सीमा को नई फ़्रंटलाइन घोषित किया है. कुछ इलाक़ें है जिन्हें चरमपंथियों ने अपना गढ़ बना लिया है. सेना और चरमपंथियों के बीच लगातार वहाँ संघर्ष होता रहता है. प्रमुख इलाक़ों पर नज़र

हेलमंद, चाघई

हेलमंद प्रांत के दक्षिणी मैदानी इलाक़ों में अफ़ग़ानिस्तान सरकार का दबदबा कम ही रहा है. ये तालेबान का मुख्य गढ़ बनकर उभरा है. कुछ दूर पाकिस्तान सीमा पर ब्लूचीस्तान का दूरगामी नोशकी-चाघई इलाक़ा है.
अफ़ग़ान सीमा के पास बारामचा से तालेबान चरमपंथी गतिविधियाँ नियंत्रित करता है. हेलमंद में ब्रितानी सैनिकों का अड्डा है और अतिरिक्त अमरीकी सैनिकों को भी यहाँ तैनात किया गया है.

कंधार, क्वेटा

कंधार को तालेबानी लहर का आध्यात्मिक गढ़ माना जाता है. तालेबान नेता मुल्ला उमर ने इसे मुख्यालय बनाया था जब 1996 में तालेबान सत्ता में आई थी. लादेन समेत अल क़ायदा के नेता भी इसी जगह को तरजीह देते थे.
इसलिए कंधार पर क़ब्ज़ा प्रतिष्ठा का सवाल रहा है. अफ़ग़ानिस्तान में सबसे पहले आत्मघाती हमले कंधार में 2005-06 में हुए थे. हामिद करज़ई पर भी यहाँ हमला हो चुका है
अफ़ग़ान सरकार इस बात में सफल रही है कि उसने कंधार के किसी अहम हिस्से पर तालेबान का क़ब्ज़ा नहीं होने दिया. गठबंधन सेना के भी यहाँ अड्डे हैं. लेकिन ग्रामीण इलाक़ों में तालेबान का दबदबा है ख़ासकर पाक सीमा के पास.
अधिकारियों का कहना है कि कंधार सीमा के पास और पाकिस्तान के ब्लूचिस्तान प्रांत की राजधानी क्वेटा का इस्तेमाल तालेबान छिपने के लिए करता आया है. कुछ लोग मानते हैं मुल्ला उमर कंधार या हेलमंद में छिपे हैं.

स्वात


उत्तर पाकिस्तान में बसी स्वात घाटी में लंबे समय तक ब्रितानी समय की क़ानून व्यवस्था लागू थी लेकिन 90 के दशक में एक अदालत ने इसे ग़ैर क़ानूनी करार दे दिया था.इसके बाद स्वात में इस्लामिक क़ानून लागू करने के लिए स्वात और मालाखंड में हिंसक अभियान शुरु हो गया.
हालांकि 1994 में इस हिंसा का ख़ात्मा कर दिया गया था लेकिन 9/11 हमलों के बाद ये अभियान फिर शुरु हो गया. और इसमें वज़ीरिस्तान, बाजौड़ और दीर ज़िले के चरमपंथी भी शामिल हो गए.
अप्रैल 2009 में सरकार और स्थानीय तालेबान के बीच समझौते के तहत स्वात में शरिया क़ानून लागू हो गया लेकिन समझौते के मुताबिक चरमपंथियों ने हथियार नहीं डाले. चरमपंथियों ने इसी दौरान अपनी पहुँच बुनेर तक बना ली यानी इस्लामाबाद से करीब 100 किलोमीटर दूर. अफ़गान सीमा से सेट दीर ज़िले में चरमपंथियों की मौजूदगी भी अंतरराष्ट्रीय सेना के लिए ख़तरा बनी हुई थी.
स्वात से तालेबान का हटाने के लिए पाकिस्तानी सेना ने 2009 में बड़ा अभियान चलाया. सेना का कहना है कि उसने बहुत सारे इलाक़ों से तालेबान को खदेड़ दिया है. स्वात के मिंगोरा शहर पर मई पर कब्ज़ा कर लिया गया था.

ज़ाबुल


ज़ाबुल कंधार के उत्तर में स्थित है और रिपोर्टों के मुताबिक चरमपंथी इस इलाक़े का इस्तेमाल विशेष परिस्थितियों में करते हैं. वर्ष 2002 में तालेबान चरमपंथी अमरीकी अभियान के बाद भाग रहे थे तो वे ज़ाबुल के ज़रिए ही अफ़ग़ानिस्तान में दोबारा घुसे थे.
ज़ाबुल के ज़रिए अफ़गानिस्तान के ग़ज़नी, उरुज़गान और कंधार इलाक़ों तक पहुँच बनाई जा सकती है. इस इलाक़े में बहुत कम गठबंधन सेना के सैनिक मौजूद हैं. चरमपंथियों के कारण यहाँ के हाईवे पर अधिकारी या राहतकर्मी यात्रा नहीं करते.

कुर्रम, औरकज़ई, खाइबर


पाक-अफ़गान सीमा से अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल (56 कीलोमीटर की दूरी) पर अभियान चलाने के लिए कुर्रम सबसे अच्छी जगह है. लेकिन ये शिया बहुल इलाक़ा है जो धार्मिक कारणों से तालेबान के विरोधी रहे हैं. इसलिए तालेबान यहाँ गढ़ नहीं बना पाया है.

दक्षिण वज़ीरिस्तान


पाकिस्तान के फ़ाटा का कबायली ज़िला दक्षिण वज़ीरिस्तान अफ़ग़ानिस्तान के बाहर इस्लामिक चरमपंथियों का पहला गढ़ माना जाता है. तोरा-बोरा से निकाले गए चरमपंथियों ने 2001 के बाद यहीं शरण ले थी. दक्षिणी वज़ीरिस्तान के पूर्वी हिस्से में महसूद कबीले के लोग रहते हैं और मुख्य कमांडर बैतुल्ला महसूद रहे हैं. हालांकि वे ज़िंदा है या नहीं इसे लेकर संशय की स्थिति बनी हुई है. वे पाकिस्तान में सबसे बड़े चरमपंथी संगठन के नेता माने जाते हैं. महसूद ने 2006 में तहरीक तालेबान पाकिस्तान संगठन बनाया था.

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पर्यावरण के लिए हम क्या कर सकते हैं?


पर्यावरण दिवस ५ जून को आतहैहमारआसपाहवा, पानी और वातावरण के नाम पर एक दिन। तो क्या सालभर में हम पर्यावरण में जितनी गड़बड़ियाँ फैलाते हैं वह इस एक दिन में ठीक की जा सकती हैं? सालभर में फैलने वाली गड़बड़ियाँ दूर करने के लिए सालभर की अपनी आदतों में थोड़ा-थोड़ा सुधार जरूरी है। हमारे छोटे-छोटे काम सालभर चलते रहेंगे तो पर्यावरण ठीक रहेगा। पर्यावरण की हालत कैसी है और अपने पर्यावरण के लिए हम क्या कर सकते हैं आज इन्हीं छोटे-छोटे तरीकों पर गौर करते हैं।


रिसाइकल

* घर के उपयोग में आने वाले कचरे में ध्यान दो, क्या-क्या है। इसमें तुम्हें कई तरह की चीजें दिखाई देंगी। कागज, प्लास्टिक और काँच और रोजाना किचन से निकलने वाला सब्जी-भाजी का कचरा भी।

* कोशिश करो कि इनमें से जो कचरा कबाड़ी वाले को बेचा जा सके वह उसे दे दो। वहाँ से पुराने आयटम रिसायकल सेंटर तक पहुँचते हैं और फिर इन्हीं चीजों से नई चीजें बनकर तुम तक पहुँच जाती हैं। उपयोग में आई प्लास्टिक की रिसायकलिंग से नया सामान बन जाता है। कागज, काँच और धातु से बनी चीजें भी रिसायकल हो जाती हैं।

* कचरे के डिब्बे में फेंक देने पर देर से अपघटित होने वाला कचरा जमीन, पानी और हवा को बिगाड़ता रहता है।

* याद रहे सब्जियों और खाने-पीने की चीजें जल्दी मिट्टी में मिल जाती हैं पर प्लास्टिक और धातु की चीजों को सालोंसाल लगते हैं।

ध्यान रहे कि इन दिनों शहरों में नगर-निगम दो डिब्बे रखने लगा है। एक जल्दी सड़ने-गलने वाले पदार्थों के लिए और दूसरा लंबे समय में ‍अपघटित होने वाले कचरे के लिए। देखो, तुम अपना कचरा कहाँ फेंक रहे हो?

री-ड्‍यूस
ग्लोबल वार्मिंग इस समय बड़ी चिंता है। पृथ्वी पर जिन चीजों का उपयोग हम कर रहे हैं उनमें तापमान में क्रमश: वृद्धि हो रही है। तापमान के बढ़ने की मुख्‍य वजह है फैक्टिरियों से निकलने वाला धुआँ। हम उसे तो रोक नहीं सकते पर अपनी जरूरतों को थोड़ा बहुत बदल सकते हैं। अपने घरों में दिन के समय बत्तियाँ कम से कम जलाएँ। अगर किसी कमरे में अँधेरा रहता है तो खिड़की खोल देने पर उस कमरे में रोशनी हो सकती है।

घर के सारे बिजली से चलने वाले उपकरणों को घर से बाहर जाते हुए मेन स्विच से बंद करें। इस तरह बिजली के बिल में भी थोड़ी कटौती होगी और ज्यादा बिजली बनाने के लिए कोयला भी नहीं जलाना पड़ेगा। पृथ्वी का तापमान भी कुछ कम पड़ेगा।

फ्रिज के पानी के बजाय मटके का ठंडा पानी ज्यादा बेहतर है। मटके के आसपास एक गीला कपड़ा लपेटकर रखोगे तो पानी के लिए फ्रिज बार-बार नहीं खोलना होगा और बिजली बचेगी।


प्लास्टिक की थैलियाँ शहरों में ज्यादा प्रदूषण फैलाती हैं, तो पुरानी कपड़े की थैली सामान लेने जाते समय उपयोग में लें। कपड़े की थैली बार-बार उपयोग में आती है।

री-यूज
प्लास्टिक की थैलियाँ शहरों में ज्यादा प्रदूषण फैलाती हैं, तो पुरानी कपड़े की थैली सामान लेने जाते समय उपयोग में लें। कपड़े की थैली बार-बार उपयोग में आती है।

किसी भी पुरानी चीज को फेंकने के बजाय उसका दूसरा इस्तेमाल जरूर सोचें। किसी भी पुरानी वस्तु को री-साइकिल करके नई वस्तु बनाने में भी ऊर्जा की खपत होती है तो री-यूज ज्यादा बेहतर है।

और यह भी करें
* एक पौधा लगाओ और उसे बड़ा करने की जिम्मेदारी भी लो।
* बिजली के बिल में कटौती करने वाले उपाय सोचो।
* पुराने बल्ब पर जमी धूल पोंछने पर कमरे में दो के बजाय एक ही बल्ब से काम चल जाएगा।
* गर्म पानी से नहाने की आदत बदलोगे तो भी चल सकता है।
* एक सूची बनाकर देखो कि इस महीने तुम किन आदतों को बदलकर बिजली में कटौती की।

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